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श्री गणेश चालीसा (2nd)

 

चालीसा

“चालीसा” हिंदी के शब्द “चालीस” से लिया गया है, ठीक वैसे ही जैसे, अंग्रेज़ी में सोननेट (14 पंक्तियों) और लिमेरिक (5 पंक्तियों) की तथा तमिल में वेन्बा (4 पंक्तियों) और कुरल्पा (2 पंक्तियों) की होती है। इसलिए चालीसा में ठीक चालीस चौपाइयां होती हैं। इस के अतिरिक्त संग्रह में कुछ  दोहे भी होते हैं। चालीसा में देवता के जीवन और उनके दिव्य गुणों का वर्णन होता है इसलिए चालीसा पढ़कर याँ गा कर हम उनके जीवन और गुणों को याद करते हैं और अपनी सच्ची श्रद्धा भावना अर्पित करते हैं।

श्री गणेश चालीसा में भी चालीस चौपाइयां हैं। इस के अतिरिक्त संग्रह के शुरुआत में एक दोहा और अंत में दो दोहे हैं। ये अवधी भाषा में लिखी गयी है। गणेश जी के जीवन से जुडी दो दंत कथाएं प्रचलित हैं इसलिए दो चालीसाएं भी हैं। निचे हिंदी में दूसरी चालीसा दी गयी है।

श्री गणेश चालीसा (2)

॥दोहा॥

बुद्धि भरन अशरण शरण, हरण अमंगल जाल।
सिद्धि सदन करिवर बदन, जय जय गिरिजालाल॥ 

॥चौपाई॥

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू ॥1॥
जै गजबदन सदन सुखदाता ।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥2॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन ।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥3॥
अर्ध चंद्र मस्तक पर सोहै ।
छवि लखि सुर नर मुनि मन मोहै ॥4॥
राजत मणि मुक्तन उर माला ।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥5॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं ।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥6॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित ।
चरण पादुका मुनि मन राजित ॥7॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता ।
गौरी ललन विश्वविख्याता ॥8॥
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुडारे ।
मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥9॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी ।
एक समय गिरिराज कुमारी ॥10॥
बण्यो बदन मैल की मूर्ती ।
अति छबिवंत मोहिनी सूरती ॥11॥
सो द्वारे ड्योढ़ी पर लायी।
द्वारपाल  करि तुम्ही बिठाई॥12॥
असुर एक शिव रूप बनावै ।
छल करनि हित घात लगावै॥13॥
ताहि समय शंकर भी आयो।
बिन पहिचान जान नहीं पायो॥14॥
पूछहिं शिव तुम केहि के लाला।
बोलत भे तुम बचन रसाला॥15॥
मैं गिरीजा सुत तुमहिं बतावत।
बिनु चीन्है कोउ जान न पावत॥16॥
भवन धरो जनि पाँव उभारी।
अहै कौन पहिचान तुम्हारी॥17॥
आवहिं मातु बुझि तब जाओ।
बालक से जनि रारि बढाओ॥18॥
धर्यो शम्भू जब पाँव अगारी।
मच्यो तुरत सरबर तब भारी॥19॥
तत्क्षण कछु शंका उर धारी।
शिव तिरशूल भूल वश मारी॥20॥
सिरसा फूल सम शिर कटि गयऊ।
चट् उड़ि गगन लोप तहँ भयऊ॥21॥
शम्भू गए जब भवन मंझारी।
बैठी जहँ गिरिराज कुमारी॥22॥
कहन लगे शिव मन सकुचाई।
कहो सती सुत कहँ ते जाए॥23॥
तुरतहिं कथा प्रगट भई सारी।
करीं सोच गिरिजा मन भारी॥24॥
कियो न भल स्वामी तुम जाओ।
लाओ सुवन जहाँ से पाओ॥25॥
चले तुरत सुनि शिव बिज्ञानी।
चट् इक हस्ति के शिर आनी॥26॥
धड़ ऊपर थापित करि दीन्हे।
प्राणवायु संचालन कीन्हे॥27॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
बनहु बुद्धि-निधि अस वर दीन्हे॥28॥
प्रथम पूज्य तुम हो सुख दाता।
अति शुचि विद्धा-बुद्धि सुज्ञाता॥29॥
नाम तुम्हार प्रथम लै कोई।
कारज करै सकल सिद्धि होइ॥30॥
तुम सुमिरत सुख संपत्ति नाना।
तुम्हे बिसारे नहीं कल्याना॥31॥
तुम्हरो शाप आज जग अंकित।
चौथ मयंक भयो अकलंकित॥32॥
बुद्धि परीक्षा तुहि शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥33॥
चले षडानन भूमि भुलायी।
रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई॥34॥
राम नाम लिखी महि पर अंका।
सात भँवर दी करी न शंका॥35॥
धनि गणेश कहि शिव मन हर्षे।
नभ ते सुरन सुमन बहु वर्षे॥36॥
तुम्हरो महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहस मुख सकेँ न गाई॥37॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥38॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥39॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥40॥

॥दोहा॥

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धरि ध्यान।
नित नव मंगल गृह लहे, मिले जगत सन्मान॥
दुइ सहस्त्र दस विक्रमी कृष्ण भाद्र तिथि गंक।
पूरण चालीसा भयो, सुंदर भक्ति अभंक॥

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